एक बार की बात है, सम्राट अकबर अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी में बैठे थे। उनके दरबार में बीरबल एक प्रसिद्ध और बुद्धिमान मंत्री थे, जिनकी समझदारी से अकबर हमेशा प्रभावित रहते थे। एक दिन अकबर ने सोचा कि वह बीरबल की बुद्धिमानी को और परखें, ताकि वे अपने दरबार के सबसे योग्य व्यक्ति का चुनाव कर सकें।
अकबर ने बीरबल से कहा, "बीरबल, मुझे बताओ, क्या तुम जानते हो कि सच्चाई का रंग क्या होता है?"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "महाराज, सच्चाई का कोई एक रंग नहीं होता, वह समय, स्थान और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
अकबर ने यह सुनकर सोचा, "क्या सच में ऐसा हो सकता है?" उन्होंने बीरबल को परखने के लिए एक योजना बनाई। अकबर ने एक दिन दरबार में घोषणा की, "जो व्यक्ति सच्चाई का सही रंग बता सके, उसे मैं बड़ा इनाम दूँगा।"
सभी दरबारी अपनी-अपनी राय देने लगे। कोई कहता कि सच्चाई सफेद होती है, तो कोई कहता कि सच्चाई काली होती है। कुछ ने कहा कि सच्चाई नीली होती है, और कुछ ने लाल रंग बताया। परन्तु कोई भी बीरबल की बातों से ज्यादा संतुष्ट नहीं था।
अंत में, बीरबल ने अकबर से कहा, "महाराज, सच्चाई का रंग हर किसी की नजर और समझ के अनुसार अलग हो सकता है। पर अगर आप चाहें, तो मैं आपको इसका सही उत्तर दे सकता हूँ।"
अकबर ने बीरबल की चुनौती स्वीकार की और कहा, "तो ठीक है, बीरबल, तुम हमें सच्चाई का रंग बता दो।"
बीरबल ने कहा, "महाराज, सच्चाई का रंग वह है, जो आपकी आँखों में हो। यह वही रंग है, जो आपके दिल में सही और गलत के बीच का अंतर देखे।"
अकबर बीरबल की बातों को समझ गए और मुस्कुराते हुए बोले, "बीरबल, तुमने सही कहा। सच्चाई का रंग वही है, जो हमारी अपनी आँखों और दिलों में होता है। तुमने मुझे एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया है।"
सीख: सच्चाई का कोई एक रंग नहीं होता, वह हर व्यक्ति की दृष्टि और समझ पर निर्भर करता है। सच्ची समझदारी और बोध से ही हम सही रास्ते पर चल सकते हैं।
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