कृष्ण और सुदामा की मित्रता

कृष्ण और सुदामा की मित्रता



बहुत समय पहले की बात है, द्वारका में भगवान श्री कृष्ण अपने महल में रहते थे। वह एक महान सम्राट थे, लेकिन उनके दिल में हमेशा अपनी मित्रता का सम्मान था। उनके बचपन के एक प्रिय मित्र सुदामा, जो एक ब्राह्मण थे, बहुत गरीब थे और द्वारका में कृष्ण से मिलने के लिए उनके घर से लंबी यात्रा तय कर रहे थे।

सुदामा ने सोचा, "कृष्ण तो भगवान हैं, उनके पास सब कुछ है। क्या वह मुझे अपनी दीन-हीन स्थिति में देख कर मुझे मदद देंगे?" लेकिन सुदामा का मन कृष्ण के प्रति अपार श्रद्धा से भरा हुआ था, और उन्होंने तय किया कि वह बिना किसी लालच के बस कृष्ण से मिलेंगे।

वह अपने घर से कुछ मुट्ठी भर चिउड़े लेकर द्वारका के लिए चल पड़े। मार्ग में उन्हें बहुत कठिनाइयाँ आईं, लेकिन वह अपनी यात्रा में दृढ़ नायक की तरह बने रहे। जब सुदामा द्वारका पहुंचे, तो द्वारपालों ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति दी, और भगवान कृष्ण को जब यह समाचार मिला, तो वह दौड़ते हुए सुदामा के पास गए।

कृष्ण ने सुदामा को अपने महल में स्वागत किया, उन्हें उत्तम वस्त्र पहनाए और उन्हें अपनी ताम्र थाली में स्वादिष्ट भोजन दिया। सुदामा ने भगवान कृष्ण से कहा, "प्रभु, मैं बहुत गरीब हूँ, और केवल आपके दर्शन की इच्छा लेकर यहाँ आया हूँ। मुझे कुछ नहीं चाहिए।"

कृष्ण ने हंसते हुए कहा, "मित्र, तुमने मुझे जो चिउड़े भेजे थे, वह मेरे लिए अमूल्य हैं। अब मैं तुम्हारे लिए सब कुछ दे दूँगा।"

कृष्ण ने अपने दिव्य दृष्टि से सुदामा के घर को देखा और उसकी गरीबी को हर लिया। अगले ही पल, सुदामा के घर के बाहर सोने-चांदी के बर्तन और बेशुमार धन की वर्षा होने लगी। सुदामा आश्चर्यचकित थे, क्योंकि उन्होंने कृष्ण से कुछ नहीं मांगा था।

कृष्ण ने कहा, "सच्ची मित्रता और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। तुमने मुझे बिना किसी लोभ के प्रेम दिया, यही सबसे बड़ी दौलत है।"

सुदामा ने भगवान कृष्ण के चरणों में सिर झुका दिया और कहा, "प्रभु, आपने मेरी दुनिया बदल दी, और मैं सदा आपका आभारी रहूँगा।"

सीख: सच्ची मित्रता और निस्वार्थ भक्ति से भगवान हमेशा अपने भक्तों की मदद करते हैं, क्योंकि उनका प्रेम बिना शर्त होता है।
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